Friday, October 4, 2013

Now my Dream is the only place where I meet her.

वो दफ़ा भी क्या था जब हम उनसे रोजाना मिलते थे.
मुस्कुराए वो पर दुल्हन की तरह हम खिलते थे. 
दिल तो छुई मुई हो चला था, भाव भी क्या मचलते थे. 
उनसे मुलाकात के तो हर दिन हम तरसते थे. 
नयना ढूंढें उन्हें हर जगह, कभी तो दरसन हो पाएंगे.
प्यासी आखों ये कभी ख़ुशी के पानी पी पाएंगे. 
अब तो वो दूर चली, हमने भी उनसे अलविदा कह दिया. 
सपना ही रह गया वो जगह; जहाँ मिल रहे दो अब दो जिया. 
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Saturday, September 21, 2013

RECAPPING THE PAST @ Lanka Chai ki Dukaan!!!

So, Friends!! Tadaima.... After long time my mood is in fertile condition to write something...
So, there is month of September and I still live in Varanasi.. By the way, there is no use to stay here in Varanasi but something is still here which bond me to stay. Don't know what is that.. May be for Friends, or for Japanese or May be Both!! So, I am talking about this September. This month had come with many changes; changes in situations of Japanese class, changes in myself, changes in Sensei...... So many changes, so many happenings in previous few days... and Yesterday me Nobita San RECAPPING THE PAST MOVEMENT OF PAST.@ Lanka Chai ki Dukaan.
  • Last Feb, I met you at the Japanese Cultural Event, 2013. We had little talk that time.
  • Next, We celebrated Sensei's B'Day party at sensei's home. Tanoshii katta..
  • Sono ato de, on 2 or 3 of March Watashitachi ha Raj Dari and Dev Dari ni ikimashta. Picnic with Nao Sensei, Suzy Sensei and we Gakusei,
  • Sore kara, We went for Ganga Isnaan. Danger.. awww!! demo, sono hi ha totemo yokatta. watashitachi ha takusan hanashi mashita @ Shiva Cafe.
  • The time had come when our officially class had been over. That day was totally ever minding in my mind. We talk to our Nao Sensei about our future. Nao Sensei, soro soro osewa ni narimashita.
  • At day of 25th of April, Nao Sensei had come to my Hostel to meet me. ureshii katta. I hadned over a letter to which I tried  to write in whole night.
  • The day of 26 of May, Suzuki Sensei mo Nihon ni kaeru node, Varanasi kara demashita. We went to eki to see off Sensei.
  • Oh, I forgot to mention Bau Shaab ki Chai and at Lanka again Chai. Thank U Bahu Shaab and Lanka no chai mise. 
  • Oh, The last class.. every one had nakushi mashita.
  • I remember that movement when me and Nobita see off Suzy Sensei, at returning he wept lot.
  • Changes had been coming on June and July and August also.
  • So, September came, I met Reioko San, Shizuka San, Yurika San and Yagi Sensei. Miyagi no Gakusei. Kyonen no Dec ni Varanasi ni kimashita. Ureshii katta.
  • On 3rd September, We met a Japanese group. I enjoyed Origami, Shodo and last discussion.
  • 5th of September @ 12:00am, Happy B'Day  Reioko San. 
  • When they return, the movement again became emotional. Nobita was feeling very bad coz they were returning to Japan. #Sayonaro daik suki na hito.. when we come down form the train, Train has been started but suddenly it stopped and also my Heart wanted to go in that Flash Back carriage. 
  • Again , One week gap at home, I returned to Varanasi. Something missing here right now... Coz Specially to Nao Sesnei, I say" Sorry!" "Gomen na sai!" for not contacting you when I was at home.  
Ima only I have to Ganbari masu........ And I do.. \( `.∀´)/

Wednesday, August 14, 2013

Happy Independence Day...

एक दफा की बात है जब देश में हाहाकार थी;
अंग्रेजों के अत्याचार से देश बड़ी बीमार थी.
कुछ के कमर झुकते थे, कुछ के झुका दिए जाते थे
गर कोई न करता था बर्दाश्त उस अत्याचार को.....
दुनिया से उन्हें मिटा दिए जाते थे.
उन्ही बीच में कुछ फौलाद हुए ऐसे जो झुकाये न झुकते थे मिटाए न मिटते थे.
देश हमारा गैरों का न रहे कभी,
मिट्टी इस मुल्क की उनकी आन बान और शान थी.
कोई रौंदे इस मिट्टी को अगर लड़ने को उनमे जान थी.
मिली आजादी थी हमें;
गैरों की दी न ये दान थी.
फ़क्र है जिस आज़ादी पर वह तो वीरों की कुरबान थी.

ये तो थी फ्लैशबैक की कहानी जो हर बार दोहराई जाती है.
१५ अगस्त और २६ जनवरी को सबको याद दिलाई जाती है.

पर सच बतायें तो अभी भी हम गुलाम हैं.
भ्रष्टाचार की लाचारी से सब हुए परेशान हैं.
लाइलाज बीमारी है ये समाधान अब संभव नही..
क्यूंकि इसी बीमारी से ग्रसित हम भी एक इंसान हैं.
पंचतत्व के इस शरीर पर लालच बड़ी हावी है,
प्यार, पैसा और पढाई उसकी सबसे बड़ी लाचारी है.
कहें तो ये तीन चीजें उसके सबसे बड़े हथियार हैं,
पर कमज़ोर हो रही लगन की प्रेरणा से युवा हुए अब लाचार हैं.
पर लाचारियों पे अब हमे नही है रोना..
क्यूंकि एक कोने में हर दिल ने एक आग ऐसा पारा है,
किसी की चिंगारी भड़क रही है तो कोई बना एक ज्वाला है.
ये लौ एक दिन नया परिवर्तन लाएगी,
अपने तांडव की नाच में सारी गुलामियों का नाश कराएगी.
देश ने नयी आज़ादी की आज की फिर मांग है
सुनो ए मुल्क वालों !! सबकी ये सबसे और पहेले अपने से ,
जारी ये फ़रमान है...
आज़ादी की इस टुकड़ी में शामिल बन्दा ही बस इंसान है.. बन्दा ही बस इंसान है..
बने हम खुद फौलाद बनकर कारवां तो बढ़ता जायेगा..
विकसित ये शशक्त भारत फिर से अज़ाद कहलायेगा...
फिर से आज़ाद कहलायेगा.
JAI HIND JAI BHARAT!! 

Monday, August 5, 2013

अब तो हम बेरोजगार हो गये.... :'(

दोस्तों आखिरी जुलाई का महीना मेरे लिए सबसे यादगार रहेगा. क्यूंकि मुझे उसी महीने में काफी खुशियाँ मिली थीं और महीने का आखिरी आते आते गम भी दे गयी. वो जुलाई का महीना मेरे करियर के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण महीना था. काफी आशाएं लगाये हुए बैठा था. पर निराशा जब हाथ लगी तो दिल टूट सा गया. गलती वैसे मेरी ही थी जिसका खामियाजा मुझे ही भुगतना पड़ा. सपना था जेएनयू में पढाई करने का. सपना सच होता भी लगा. पर जब वहां गया तो उन्होंने मुझे इनकार कर दिया. मेरे किये का फल ये मिला की मैं निराश होकर वापस बनारस आ गया. पर यहाँ भी मुझे निराशा ही हाथ लगी. और अब कुल मिला कर मैं बेरोजगार व्यक्ति हो गया हूँ. मेरे पास एक साल के लिए कोई पढाई नही है. मैं केवल अपने बैक पेपर की तयारी कर सकता हूँ और मुझे अपनी जापानी भाषा को और मजबूत बनाना है. मैंने आगे कोई कंप्यूटर कोर्स करने की सोची है. और अगले साल फिर से बिना किसी दाग लिए हुए जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय में फिर से आना है. और वहां पूरी मेहनत करना है ताकि मैं अपने सेंसेयी, दोस्तों और परिवार वालों के सामने खरा उतरना है. अभी इस साल मेरा टारगेट रहेगा कि सबसे पहेले मैं गणित को पास करके अपना स्नातक पूर्ण करूं और फिर जापानी भाषा पे अपना पूरा शत प्रतिशत दूं. इसके लिए मुझे बस आप सब दोस्तों का दुआ चाहिये की मेरा ये साल खूब ख़ुशी और खाब पढाई के साथ बीते. अगले साल एक स्मार्ट और गम्भीर आदी आप लोगों के सामने आये. 

Sunday, June 23, 2013

खुमारी या प्यार..???

दिल के इस गलियारे में उनका आना जाना रहता है,
शान्त रहती हैं ये महफ़िलें फिर भी दिल गुनगुनाया करता है।
आते हैं जब कभी भी वो इस गलियारे में दो टुक बातें हो जाती हैं,
पर दिल की बात बताने में दिल ये जी चुराता है।
जी तो करता है कि आशियाना बना लूं, इस गलियारे में कहीं...
कैद कर लूं  आपको उसी में वहीँ.
पर देख के आज़ाद पंछी सा आपका खुमार
चहेरे पे हरदम हँसी और दिल में प्यार....
छिपा लेते हैं अपने पागलपन को;
लेकिन चोर ये दिल करता रहता है आपसे प्यार.
कहीं दफ़न न हो जाये ये चाहत मेरी
आसूं भी न बहा पाऊं;
झूठी ये दिल की बातें मेरी
कैसे इन्हें छोड़ पाऊँ।
शिद्दत कहीं कमज़ोर है,
कायनात अब बेचारी है
लाख कोशिशें की हमने पर
                                                    न उतरे, प्यार की ये खुमारी है।।

Tuesday, June 18, 2013

बहुत ही उहापोह है इस लाइफ में भाई...

हेल्लो दोस्तों कैसे हो? क्या है बड़े दिनों बाद वो भी जबरदस्ती खुद को इस पेज पे लिखने के लिए लाया हूँ. साला पूरा का पूरा मेरा टैलेंट ही ख़तम हुआ जा रहा है. कभी मैं चित्रकारी करता था फिर कविता भी करने लगा. और फिर कुछ कुछ लिखने भी लगा. पर आज कल पता नही क्या हो गया इस दिमाग को कि कुछ नया सोच ही नही पा रहा है? तो बात ऐसा है कि अभी मैं सदमे में चल रिया हूँ. सदमा? लगा न अज़ीब! लगना भी चाहिये. असल में बात ये है की इस बंदे का गणित के नाता नही छूट रहा है. न जाने क्यूँ वो मेरे पीछे हाथ दो के बैठी है? पर कभी जब उसे बाहों में लेना चाहूं तो वो बाहों में आती भी नही है. बस मुझे दुःख दे कर के तड़पाती है. चलो round round नही घुमाता हूँ और मैं अपनी औकात में आता हूँ. दरअसल मेरी परेशानी ये है कि मेरा गणित में स्नातक स्तर के आखिरी पड़ाव पे फिर Back लग गया है. मैं सभी विषयों में पास हूँ पर यही आखिरी में गणित में  back लग गया. वैसे प्रयास जारी है हम लोगों का विशेष पुनः परीक्षा करने के लिए. और आशा की किरण भी दिख रही है. पर अब दिक्कत क्या हो रही है? दिक्कत ये है की मैं पढाई नही कर रहा हूँ. अभी मैं यहाँ बनारस में हूँ. किस लिए? असल में मेरा जुलाई में जापानी वाला परीक्षा है दिल्ली में. जिस कारन घर पर  न पढाई कर पाने के बहाने मैं वापस बनारस आ गया था. वैसे ऐसी बात नही की मैं किताब भी उठा के नही देख रहा हूँ. मैं देख रहा हूँ. पर  वो वाली संतुष्टि नही मिल रही जो मिलनी चाहिये. और अगर बात की जाये मेरे  back paper Mathematics कि तो वो तो रत्ती भर भी पढाई नही हो रही है. मुझे इस बात का भी डर लग रहा है की कहीं मुझे एक साल बैठना न पड़ जाये. क्यूंकि ये बैक पेपर शायद अगस्त में हो. जिस कारन रिजल्ट में लेट और फिर किसी अन्य संस्थान या विश्वविद्यालय में दाखिला लेने भी असमर्थ. देखो क्या होता है? मैं हरदम अपनी जिन्दगी को ताने देता रहेता हूँ. कितनी नकारात्मक ऊर्जा भरी है मेरे अन्दर. कभी अच्छा और कुछ मेहनत करने का सोचता ही नही है. इस समय सभी लोग कहीं न कहीं अच्छे संस्थान में चले गये हैं. तो कोई अच्छी सरकारी नौकरी के लिए तैयारी करने जा रहा है. पर हम क्या करेंगे? ये हमे ही नही पता चल रहा है. मेरा विज्ञान से मन हट गया है और मुझे अब जापानी भाषा अच्छी लगने लगी है. और मैं आगे की पढ़ाई इसी जापानी भाषा को ले कर करना चाहता हूँ. पर मुझे अभी भी पता नही क्यूँ ये लग रहा है की मैंने जापानी भाषा इस लिए चुनी क्यूंकि मैं अब विज्ञान संभाल नही पा रहा था. न की इस लिए चुनी क्यूंकि मुझे ये भाषा अच्छी लगती है. उम्र के इस पड़ाव पे उहापोह की ये स्थिति बहुत ही खतरनाक मालूम हो पड़ती है. क्या करें क्या न करें? कुछ समझ नही आता है. बचपन में कुछ और मन था कि बड़े होकर पुलिस में जायेंगे. फिर 8वीं में आया तो मेरा वो सबसे अच्छा समय चल रहा था पढ़ाई में. उस समय मैं प्रोफेसर बनना चाहता था. 10वीं में आने के बाद एक बार एक टीचर की बातें सुन कर मुझे लगा कि मुझे पत्रकार बनना चाहिये. फिर जब मैं 12वीं में आया तो ये विचार किया कि पहले मुझे एक समान्य स्नातक की पढ़ाई करनी चाहिये ताकि मेरे पास एक बैकअप रहे की मैं किसी नौकरी के लिए आवेदन कर सकूँ. पर यहाँ आने के बाद मेरा पढ़ाई में ग्राफ नीचे ही गिरता गया कि अब मैं इस स्थिति आ गया हूँ कि पता नही चल रहा है कि अब मुझे क्या करना चाहिये? किस रास्ते पे जाऊं? क्या मैं जापानी भाषा से अपना आगे का मार्ग प्रशस्त करना ठीक रहेगा? कहीं मैं फिर न डर जाऊं और फिर कहीं का नही रह जाऊं! डर लगता है पर Life is a Race, If you pichding you become BROKEN ANDA. तो लाइफ की रेस ऐसी है की आपको आँख बंद करके चलना पड़ता है. पर जो भी अपनी आँखें खोल के चलता है वही रेस के आखिरी रिबन को छू पाता है. आशा करता हूँ की मैं भी आगे से आँख खोल कर चलूँगा. और माँ की आँख. मैं अपना करियर जापानी भाषा के द्वारा ही बनाऊंगा. 

Friday, May 10, 2013

Now become Graduate but still Bachelor....

Hello guys.. How are you all?  My all Exams are over.. feeling free but yet concerning to the competitive entrance exams. If I conclude my exams, some have gone good and some have gone bad. This time only waiting for results. This Semester I have to appear in 9 exams including Practicals, 3 Back Papers and 3 Main Hons. subject. Mission was so hard and may be I had not prepared as I should. Therefore you know Guys, my Back mathematics exam had gone worst, my Stratigraphy exam had gone bad and my  economic geology exam had gone no so good. Feeling so tense but what should be done now? nothing na! Only waiting for result na...
  These 3 years has now on end. Feeling so bad for friends, Sensei and off course for Varanasi. First time when I came to Varanasi from Lucknow, I felt noisy, polluted and dirty Banaras. I amazed how foreign people come to Varanasi. Whether they come here to see City's noise, dirtiness, pollution, animals and people or they come here for Spiritual mood, Viewing Ganga River, viewing Temples of different gods and Ghats of Ganga. I didn't know. But when I used to live in this city, I started to feel some special attachment for this city and started to enjoy Banarasi Life. Except of BHU, whole city is much noisy and rods are jerking your body. You know a theme is famous for Banaras " Rand, Sand, Saint and steps of Ghats. If you save yourself from these things, you are able to survive in this city."
 Thus I became to survive in this city. How  have these 3 years spent? Don't know. These 3 year, I saw many changes in this city, in my study, in my friends and off course in mine. If I talk about my position in study, I always stood 1st or 2nd rank from behind. Every time I worried about my study especially Mathematics and even still waiting for my back paper exams results. So, this is my study life. Meanwhile, in 2nd year, I entered in Japanese Diploma course. After that my intention changed towards foreign languages. Gradually, I made far distance from my major subjects.
  ❤ 
Our Lovely Sensei!! ❤ ❤ 

Masti wid Friends in last year HOLI! 

Nihon no jugyo no tomodachi!

Last day of 1st Level Exam in Visual art. Snap by Grima!

Minna Baka!! :P
Yu Makino San in Varanasi! Fully Masti!

Masti with Yuki Tabata, our Japanese Friend! 
Therefore, I was hardly passed in my major subjects. So this is my study condition. Let it be here, lets talk about other things. In these 3 years, I thank to GOD for giving me such nice FRIENDS, I thank to GOD for meeting me to SENSEI. Both Sensei, Nao Sensei and Suzuki Sensei are awesome. Throughout my life I remember them. LOVE YOU ALL. ❤ ❤ ❤ ❤