चलो फिर से लिखते हैं,
चलो फिर कोई नज़्म लिखते हैं.
गद्य या पद्य लिखुँ, लाज़िमी है की कोई शब्द लिखूं।
मोहब्बत के अलफ़ाज़ लिखूं या समाज को लिखूं।
अवाम को लिखूं क्या खुद को लिखूं।
चलो आज फिर से लिखूं।
बंधन को लिखूं या आज़ादी को लिखूं।
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| I used to be a car. |
हमनशीं नहीं रह गये अब उनके
कुछ अजनबी सा समझने लगे हैं वो,
उनसे दिल लगा कर खता कर ली थी क्या हमने
जो उनको अब नागवार लगने लगा है,
बातें भी बस वही चंद सी...
कोई नहीं..
जाने बहार जाने ज़िगर
धड़कता होगा शायद तेरा दिल अभी भी कभी मेरा नाम लेकर
उसी धड़कन को हमने अपनी ज़िंदगी बना लिया है।
तेरी अजनबी नज़र में अपना मुखड़ा निहार लिया है।
तुझसे मुहब्बत है मुझे, ये शायद तू भी जानती होगी।
पर न कहूँगा दिल का दर्द तुझसे
ये दर्द ही तो मेरे जीने का सहारा है।